Thursday, April 27, 2017

H1B Visa: Impact: क्या करेंगी भारतीय आईटी कंपनियां?

ट्रंप  सरकार के निशाने पर अब भारतीय आईटी कंपनियां आ गई हैं. अपने बयानों के लिए मशहूर अमेरिकन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बड़ा बयान दिया है अमेरिकी सरकार आउटसोर्सिंग को कम
करने का प्लान बना रही है. राष्ट्रपति चुनाव के दौरान भी डोनाल्ड ट्रंप के कई तरह के बयान सामने आए थे जब उन्होंने कहा था कि भारतीय आईटी कंपनियां अमेरिका के लोगों की नौकरियां छीन रही हैं. इसको कंट्रोल करने के लिए अमेरिका ने एच-1बी वीजा पर आक्रमण किया है.

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H1B वीजा:
अमेरिका में लगभग 65 हजार H1B वीजा प्रतिवर्ष दिए जाते हैं और ऐसा उन लोगों को दिया जाता है जिनके पास कुछ खास हुनर या जानकारी होती है. इस वीजा के नियम अब बहुत ही कड़े कर दिए जाएंगे.

अमेरिकी सरकार के एक अफसर ने कहा कि भारत की कंपनियां जैसे कि TCS, कॉग्निजेंट और इंफोसिस आदि वीजा पाने के लिए गड़बड़ियां करती हैं और सिस्टम की कमियों का फायदा उठाती है.

अमेरिका का यह दावा कितना सही?
  1. वीजा देने की अंतिम अथॉरिटी तो अमेरिका के ही पास है वह कैसे भारतीय कंपनियों पर यह इल्जाम लगा सकते हैं कि भारतीय कंपनियां गड़बड़ कर रहे हैं? क्योंकि वीजा तो अमेरिकन इमीग्रेशन अथॉरिटी देती है और जितने भी वीजा उपलब्ध होते हैं उतने ही लोगों को तू भारतीय कंपनियां अमेरिका भेजती हैं इसमें गलत क्या है?
  2. H1B वीजा कोई द्विपक्षीय संबंध नहीं है यह एक डब्ल्यूटीओ का एग्रीमेंट है और डब्ल्यूटीओ का अमेरिका भी एक सदस्य है. डब्ल्यूटीओ के तहत यह वीजा दिया जाता है. यह सारे काम कानून के दायरे में रहकर हो रहे हैं.
  3. इस तरह का फैसला कंपनियों में कई तरह की लॉबिंग को बढ़ावा देगा और यह लॉबिंग सिर्फ भारतीय कंपनियां ही नहीं करेंगे बल्कि अमेरिकी कंपनियां भी करेंगी.
  4.  इस सिस्टम को बंद करने के बाद अब जो भी सिस्टम आएगा क्या उसमें कोई कमियां नहीं होंगी? और इसकी क्या गारंटी है कि आगे इसका लाभ नहीं उठाया जाएगा?

क्या है बदलाव?
आपको बता दें इस तरह के वीजा देने के लिए लॉटरी सिस्टम अपनाया जाता था. अमेरिका ने कहा है कि भारतीय कंपनियां इसी सिस्टम का फायदा उठाती हैं इसलिए अब यह लॉटरी सिस्टम बंद कर दिया जाएगा.
लॉटरी सिस्टम के स्थान पर अमेरिकन चाह रहे हैं कि गुणवत्ता और सैलरी पर आधारित सिस्टम अपनाया जाए. आपको बता दें कि अमेरिका में सालाना 60 से $65 हजार प्रति वर्ष औसत आमदनी एक  भारतीय आईटी इंजीनियर की होती है जो एच-1बी वीजा के तहत आते हैं और यह अमेरिकन सैलरी से काफी कम है, करीब-करीब आधे से भी कम.

भारत सरकार का जवाब: 
भारतीय वाणिज्य मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा है कि  बहुत सारे अमेरिकन भी भारतीय कंपनियों में काम करते हैं और अमेरिका के बहुत सारे लोग भारत में नौकरियां कर रहे हैं. इसलिए अमेरिका को यह समझना चाहिए कि यह कोई एकपक्षीय मसला नहीं है. अरुण जेटली ने भी इस मुद्दे को उच्च स्तर पर उठाने की बात कही है. इन्होंने हम भारतीय हितों की रक्षा करने का आश्वासन भी दिया है.

सवाल यह भी है कि अगर भारत इस पर कड़ा रुख अख्तियार करता है तो अमेरिका अपना यह निर्णय बदलेगा? उत्तर है नहीं. क्योंकि अमेरिका का यह निर्णय आर्थिक से ज्यादा राजनैतिक है. क्योंकि ट्रंप इन्हीं सब मुद्दों पर अमेरिका के राष्ट्रपति बने हैं.

यह जो मसला है उससे हमें उत्तेजना में आकर समाधान नहीं खोजना चाहिए. हमें यह भी समझना चाहिए कि यह एक सहजीविता का मामला है. मतलब भारत और अमेरिका दोनों को ही एक दूसरे की जरूरत है.

भारतीय इंजीनियरों की अमेरिका को जरूरत:
एक बात और गौर करने की है कि जितनी जरूरत भारतीय आईटी इंजीनियर को अमेरिकन कंपनियों की है उतनी ही या कहें तो उससे ज्यादा जरूरत अमेरिकन कंपनियों को भारतीय प्रोफेशनल्स की भी है. क्योंकि आजकल के प्रतिस्पर्धात्मक बाजार में टिके रहने के लिए आपको उच्च गुणवत्ता के लोग चाहिए और इस मामले में भारतीय आईटी इंजीनियर बाकी लोगों से बहुत आगे हैं.


भारतीय कंपनियों के पास विकल्प: 
इस फैसले पर बहुत हाय तौबा मचाने की भी जरूरत नहीं है क्योंकि ऐसा नहीं है कि अमेरिका में भारतीय कंपनियों का बाजार बंद कर दिया है भारतीय कंपनियों के पास भी बहुत सारे विकल्प खुले हैं जैसे कि: 
  1. अभी जो भारतीय कंपनियों का भारत और अमेरिका में काम करने का औसत है वह 70:30 का है मतलब 70% काम अमेरिका के बाहर और 30% अमेरिका के अंदर होता है इसको 80:20 भी किया जा सकता है जिससे कि एच-1बी वीजा की हमें कम जरूरत पड़े.
  2. भारतीय कंपनियों को अपना बिजनेस मॉडल थोड़ा-बहुत बदलना पड़ सकता है जिससे कि वह मार्केट में खड़े रह सकें.
बिजनेस मॉडल बदलने पर होने वाले प्रभाव:
एक रिपोर्ट के मुताबिक अगर जो औसत सेलरी भारतीय कंपनियां भारतीय इंजीनियर को देती हैं जोकि $65000 प्रति वर्ष है है उसको बढ़ाकर अगर 75,000 डॉलर प्रतिवर्ष कर दिया जाए तो इन सभी कंपनियों के प्रॉफिट में 1% से ज्यादा की कमी आएगी.

होने वाले लाभ:
इस तरह की रोकथाम से भारतीय कौशल को भारत में ही रोकने में मदद मिलेगी. जिससे कि हमारे कुशल इंजीनियर डॉक्टर इत्यादि हमारे ही देश में काम करने को बाध्य हो जाएंगे. जरा सोचिए कि इसके कितने दूरगामी परिणाम होंगे? आज जो अमेरिका की तकनीकी  और इकोनॉमी पूरे विश्व में परचम लहरा रही है उस में भारतीयों का कितना हाथ है अगर यही भारतीय भारत में रहकर काम करेंगे तो भारत का भविष्य आने वाले समय में बहुत उज्ज्वल होने वाला है.

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