Thursday, April 6, 2017

राजनीतिक पार्टियों से नैतिकता की उम्मीद?

राजनीति संभावनाओं का खेल है इसमें नैतिकता की कोई गुंजाइश नहीं. जैसे बन पड़े जहां बन पड़े, चाहे किसी से भी गठबंधन करना पड़े, कर लो पर सत्ता में रहना जरूरी है. राजनीति में कोई तराजू नहीं होता जिस पर आप नैतिकता तोल सको और हो भी क्यों ना  राजनीति खेल ही सत्ता का है. और राजनीतिक दल
 परस्पर दुश्मन तो नहीं कि एक दूसरे का  साथ ही ना लें, बात ही ना करें. यह सारा संघर्ष सत्ता के लिए ही तो है. जनता की किसको पड़ी है चुनाव लड़ने में करोड़ों रुपए खर्च हो जाते हैं, अगर सत्ता ना रही तो पैसे कहां से आएंगे  इसलिए भी सत्ता में रहना जरूरी है. फिर भी लोग  राजनीतिक पार्टियों से नैतिकता की उम्मीद करते हैं.

संविधान कुछ भी कहे सारा खेल पैसों का ही है. इसीलिए चुनाव के बाद पार्टियां नैतिकता भूल जाती है सारी नैतिकता चुनाव के पहले. संवैधानिक पद पर बैठा हुआ व्यक्ति भी संविधान कि नहीं  पार्टी की भाषा बोलता है उदाहरण के लिए राज्यपाल को ही  ले ले. हम कई सालों से देखते रहे हैं, राज्यपालों ने संविधान की भावना और आत्मा से खिलवाड़ किया है. उत्तराखंड, कर्नाटक, बिहार तथा अन्य कई राज्यों के मामले  कोर्ट में लंबित है अगर राज्यपाल संविधान के दायरे में रहकर काम करते तो क्या यह मामले अदालत जाते? नहीं. राज्यपालों को भी पार्टियों ने अपना राजनीतिक मोहरा बना लिया है. 
2017 के गोवा, मणिपुर, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड के चुनाव ही देख लीजिए गोवा और मणिपुर में भाजपा ने अल्पमत में होते हुए भी सरकार बना ली और यह फैसला रातो रात हो गया मुख्यमंत्री भी मिल गया और बहुमत भी. छोटी छोटी  पार्टियों ने जिनके पास  दो या तीन विधायक है सरकार बनाने लग गई, तीन सीटें जीतने वाली गोवा फार्वर्ड पार्टी के सभी विधायक मंत्री बन गए. जबकि चुनाव के पहले इस पार्टी का एकमात्र लक्ष्य बीजेपी की सरकार को हटाना था और वही उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड में जहां पार्टी को पूर्ण बहुमत मिला हुआ है मुख्यमंत्री चुनने में हफ्तो लग गए.
हालांकि कईयों का कहना है कि मणिपुर और गोवा में भाजपा को कांग्रेस से ज्यादा वोट मिले इसलिए भी भाजपा की सरकार उचित है. परंतु संविधान इसकी इजाजत नहीं देता संविधान विधायकों की बात करता है वोट शेयर कि नहीं. कई बार कम वोट शेयर वाले को ज्यादा सीटें मिल जाती हैं तो क्या उसे सरकार बनाने का न्यौता नहीं मिलेगा.
पिछले साल अरुणाचल प्रदेश और उत्तराखंड में भी संविधान को ताक पर रखकर  राष्ट्रपति शासन लागू किया गया था और अपनी सरकार बनाने की कोशिश केंद्र सरकार ने की थी यह मामला अदालत में ध्वस्त हो चुका है और दोनों सरकारें बहाल हो चुकी हैं.
ऐसा नहीं है कि यह सिर्फ एक सरकार कर रही हैं  कांग्रेस ने भी  बिहार में राष्ट्रपति शासन लगाया था जनता के जनादेश के खिलाफ और 6 दिसंबर 1992 को बाबरी ढांचा गिराए जाने के बाद कांग्रेस ने भाजपा की तीन राज्यों की सरकारों को बर्खास्त कर दिया था, जबकि यह घटना उत्तर प्रदेश में हुई थी, बाकी राज्यों की सरकारों का क्या दोष था? यानी जिसको जब भी मौका मिला येन केन प्रकारेण  सत्ता हासिल करने की कोशिश की गई. 
चुनाव आते ही नेता दल बदल करने लगते हैं जिस पार्टी की हवा देखी उसी में शामिल हो गए सैकड़ों उदाहरण है, सांसद जी इस बार सपा से हैं अगली बार भाजपा से सांसद बन गए. 
लेकिन अब समय आ गया है कि दलबदल के खिलाफ और चुनाव बाद गठबंधन के खिलाफ सख्त कानून बनाया जाए, जिस से कि ऐसी घटनाओं पर विराम लग सके.

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